इमारत के साथ रहती थी वह पुलिया

डेढ सौ साल की बुलंद इमारत और शानदार इतिहास को संजोने वाला एजी आफिस सिर्फ गणितीय उलझनों के नीरस हिसाब-किताब का ही नहीं बल्कि उस दौर के इलाहाबाद का भी रंगरेज गवाह रहा है जिस दौर में यह शहर साहित्यिक दुनिया के उरोज पर था। इस इमारत ने ना जाने कितने उन लम्हों को साझा किया जब यहीं कि एक कोने से कहकहे उठते, कोई फिकरा उछलता और फिर वह पूरे देश की साहित्यिक बिरादरी में कैसी हलचल पैदा कर देता, यह इसने देखा है। यह उस जमाने के ठहाकों की ठसक ही थी जिसने इस पुलिया की ख्याति पूरे देश में फैला दी, और यह कोना था- इस बुलन् इमारत से ठीक सटी एक पुलिया और चंद कदम दूर स्थित एक चाय की दुकान। लंच आवर होते ही यह पुलिया यारबाशों से आबाद हो जाया करती और फिर शुरू हो जाता चर्चा-परिचर्चाओं का एक अंतहीन सिलसिला। तीखी बहस मुहाबिसों के चलते ही इसे पुलिया पार्लियामेंट का नाम भी मिल गया।

ऐसा माहौल किसी दूसरे दफ़तर का था। हिसाब किताब में उलझे रहने वाले आडिटरों को इस पुलिया ने जाने कितनी कहानियों और उपन्यासों के प्लाट थमा दिये। नयी कविता के अग्रणी सर्वेश्वर दयाल सक्सेना। कोहबर की शर्त जैसे चर्चित उपन्यास और नदिया के पार के पटकथा लेखक केशव प्रसाद मिश्रा, उमाकान् मालवीय, ज्ञानप्रकाश, शिवकुटी लाल वर्मा, कमल गोस्वामी, अंजनी कुमार, नौबत राम पथिक, विश्वनाथ दूबे, अशोक संड, जौहर बिजनौरी, शिवमूर्ति सिंह सहित यहां काम करने वाले दर्जनों कलमकारों के लिए यह पुलिया मानसिक खुराक का एक अड़डा थी। पुरनियां बताते हैं कि उन लोगों की सोहबत का ही असर था कि उपेन्द्र नाथ अश्, सुमित्रानन्दन पन्, धर्मवीर भारती, लक्ष्मीकान् वर्मा और फिर बाद दूधनाथ सिंह, रवीन्द्र कालिया, ऐहतराम इस्लाम, कर्मचारी होने के बावजूद दोस्तियां निभाने ही यहां घण्टों जमे रहते। अमरकान् भी यदाकदा आकर अपनी हाजिरी लगा जाते। धर्मवीर भारती जब सम्पादक बन कर बम्बई चले गये तब भी उनके जेहन से पुलिया की याद धुंधली नहीं पड़ी और उन्होंने धर्मयुग में भी इस पुलिया पार्लियामेंट के तमाम किस्से छापे। पुरनियें बताते हैं कि पुलिया सिर्फ साहित्यिक कोर्ट मार्शल तक ही सीमित थी बल्कि जुबान और तेवरों से राजनेता भी बेदर्दी से कत् कर दिये जाते।

ऐसा नहीं है कि लोगबाग यहां सिर्फ दोस्तियां निभाने ही आते बल्कि कईयों के लिए यह दुश्मनियां निभाने का भी सबसे माकूल स्थल होता। यहां निभायी जा रही दुश्मनियों के भी अपने फायदे थे। उस समय भी साहित् की दुनिया में दुश्मन के दुश्मन को दोस् मानने का चलन आम था और इसे सार्वजनिक करने का यह सबसे उदार मंच। इस पार्लियामेंट के कभी मानद सदस् रहे चुके आखड़ेबाज बीते किस्सों को याद करते हुये बताते हैं कि उस दौरान दुश्मनियां निकालने का एक चर्चित तरीका और था-वह थी भदेस गलियां। जब महफिल पूरे शबाव में होती तो यह गलियां खुले आम नाम के साथ बकी जातीं। लेकिन यह तरीका दुश्मनी की आखिरी तारीख समझी जाती और उसके बाद वह धुंए की तरह उड़ जाती। यह इस पुलिया की और यहां के आखडि़यों की खूबी थी।


नब्‍बे का दशक इस पुलिया की शान और ठाठ का था। लेकिन देश के लोकतन्‍त्र में जनतान्त्रिक पाकेटस के साथ जैसा सलूक होता आया है वैसा ही इसके साथ भी हुआ। एजी प्रबन्धन ने पुलिया को असुविधाजनक एवं अनुशासन में बाधा करार देते हुये उधर जाने वाले रास्‍ते को दीवार से चुनावा दिया। इसके बाद अब यह सिर्फ इस साहित्‍यिक नगरी के लोग इस जगह का इस्‍तेमाल नेचुरल काल के निपटान में ही करते और आखिर सत्‍ता भी तो यही चाहती है...

पुर्नश्- यहां की फोटो लगाने की बडी तबियत थी लेकिन कुछ लोगों के नास्‍टैलेजिकरण के डर से नहीं लगा रहा हूं। हां, एक बात और- अब इसकी जगह दूसरा एक अड्डा तैयार हो रहा है। यह राजस्‍व परिषद के ठीक बगल है और उसमें रंग भरने का काम शहर के लोग कर रहे हैं देखिये यहां का रंग कब चटख होता है।

उठा लो अपनी हिन्‍दी की चिन्दियां


जिस समय विभूति कालिया प्रकरण हिन्‍दी के सबसे बड़े संकटकाल के तौर पर देखा और बताया जा रहा था, एक वरिष्‍ठ कवि जो हिन्‍दी के नाम पर तमाम विदेश यात्राएं कर चुके थे, वे इसके विरोध में लेखकों के जमावाड़े को हिन्‍दी परम्‍परा में अब तक का सबसे बड़ा विरोध करार देकर अभिभूत हुये जा रहे थे, उसी समय देश की सबसे बड़ी पंचायत हिन्‍दी का भविष्‍य विचार रही थी।

मानसून सत्र के आखिरी दिन 30 अगस्‍त को उत्‍तरी मुम्‍बई से सांसद संजय निरूपम ने भोजपुरी और राजस्‍थानी को आठवीं अनूसुची में शामिल किये जाने का मामला संसद में उठाया। करीब आधे घण्‍टे तक इस मामले में चर्चा के दौरान सदस्‍यों ने इन दोनों बोलियों को हिन्‍दी से अलग नयी भाषा का दर्जा देने पर सहमति जताई। सरकार ने भी इसे विचारणीय मामला बताया। लेकिन विडम्‍बना की हिन्‍दी के बंटवारे के इस सवाल ने हमारे लिखने पढने वाले समाज के भीतर रंच मात्र का भी अलोड़न पैदा नहीं किया। हम सभी विभूति कालिया प्रकरण में सिर्फ अपने हिसाब चुकता करने को लामबंद होते रहे और ऐसे किसी मामले में विचार के लिए तानिक फुरसत भी नहीं निकाल सके। चारों और खमोशी है। शायद नेताओं की तरह हमें भी मुद़दे की तलाश है जिस पर कुछ हो जाने के बाद भोपाल गैस पीडितों के लिए बहाये गये आंसू की तरह हिन्‍दी के जिबह हो जाने पर आंसू बहा लेने का नाटक खेला जा सके और मोमबत्‍ती जुलूस में शामिल होकर अपने किरदार चमकाये जा सकें।

बहराल, करीब आधे घण्‍टे तक उस बहस में संजय निरूपम के साथ ही अन्‍य सांसदों ने भी भोजपुरी और राजस्‍थानी को आठवीं अनूसूची के तहत अलग भाषा बनाने की मांग की। उन्‍होंने 22 भाषाओं को आठवीं अनुसूची में शामिल किये जाते समय लोगों की भावना का हवाला देते हुये उन्‍हीं भावनाओं के आधार पर भोजपुरी और राजस्‍थानी को भी अलग कर दिये जाने की जरूरत बतायी। भाषा के बंटवारे की यह मांग भारत पकिस्‍तान के सरहदी बंटवारे की याद दिलाती है। भावनाओं और हक के नाम पर मांगा गया पकिस्‍तान आज करीब पांच दशक बाद भारत को कमजोर कर देने की मंशा ही साबित होता है। अब भोजपुरी के नाम पर ठीक वैसी ही कहानी दुहरायी जा रही है लेकिन अब सियासतदानों की बिसात पर हिन्‍दी है जिसके लिए भोजपुरी को मोहरा बनाया जा रहा है। चर्चा के दौरान सांसदों ने सीताराम महापात्र कमेटी का जिक्र करते हुये कहाकि 2004 में इस कमेटी की रिपोर्ट शामिल हो गयी और इस छह वर्षों के दौरान कमेटी की रिपोर्ट क्‍यूं नहीं मानी गयी। उन्‍होंने मैथिली का हवाला देते हुये कहाकि जब उसे अलग भाषा बनाया जा सकता है तो फिर भोजपुरी को क्‍यूं नहीं बनाया जा सकता। चर्चा में शामिल सदस्‍य दोनों बोलियों को अलग भाषा का दर्जा देने के लिए सरकार पर स्‍पस्‍ट आश्‍वासान देने का दबाव बना रहे थे।

हिन्‍दी से भोजपुरी को अलग करके नई भाषा बना देने की राजनैतिक मांग की पड़ताल के साथ ही हमें भाषा के उस महीन आग्रह को भी पकड़ने की कोशिश करना होगा जिसके लिए हिन्‍दी के बढ़ते कद और व्‍यापकता को खत्‍म करने की कोशिश की जा रही है।

हिन्‍दी को 14 सितम्‍बर 1949 को संघ की राजभाषा का दर्जा दिया गया। उस समय इस भाषा की व्‍‍यापकता ही इसका आधार बनी थी। राज्‍यमंत्री अजय माकन ने लोकसभा के भीतर स्‍वीकारा भी कि संविधान की आठवीं अनुसूची में भाषाओं को शामिल किए जाने के लिए संविधान में कोई मानदण्‍ड निर्धारित नहीं है। बात सीधी है कि अगर हिन्‍दी को ताकत देने वाली करीब एक दर्जन बोलियों को अलग अलग करके सभी को भाषा का दर्जा दे दिया जाये तो हिन्‍दी की व्‍यापकता खुद ब खुद खत्‍म हो जायेगी और फिर दुबली पतली हिन्‍दी के बरक्‍स अंग्रेजी को असानी से खड़ा किया जा सकेगा। आकड़ों के लिहाज से देंखे तो हिन्‍दी बोलने वालों की संख्‍या करीब चालीस करोड़ है। अगले साल नई जनगणना के आकड़ों के आ जाने बाद यह संख्‍या और कम हो जायेगी क्‍योंकि मैथिली और डोगरी को अलग करके इन्‍हें नई भाषा का दर्जा दिया जा चुका है। इसके अलावा भोजपुरी बोलने वालों की संख्‍या करीब पन्‍द्रह से बीस करोड़ के बीच है। इस तरह अगर किसी बहाने भोजपुरी को हिन्‍दी से अलग कर दिया जाता है तो हिन्‍दी की वह व्‍यापकता अपने आप ही खत्‍म हो जायेगी जिसके दम पर उसे राजभाषा का दर्जा दिया गया था। और इस तरह न सिर्फ अंग्रेजी का रास्‍ता साफ हो जायेगा बल्कि प्रभुवर्ग के हाथ में सत्‍ता भी उसी बहाने सुरक्षित बनी रह सकेगी।

हिन्‍दी को कमजोर करने की यह कोई पहली कोशिश नहीं हो रही बल्कि इसके पहले 2004 में मैथिली और डोगरी को अलग करके हिन्‍दी को कमजोर करने की शुरूआत हो चुकी है और उस समय भी हमारा हिन्‍दी समाज ऐसा ही चुप बैठकर बंटवारे के तमाशे को देखता रहा। उस बंटवारे की वजह से हिन्‍दी समाज आज बिहार और झारखण्‍ड की एक बड़ी आबादी से हाथ धो चुका है। यह मांग सिर्फ भोजपुरी और राजस्‍थानी तक ही सीमित नहीं है बल्कि अवधी और छत्‍तीसगढ़ी को भी अलग भाषा बनाने की भी मांग की जा रही है जो इन दो बोलियों के अलग हो जाने के बाद निश्चित तौर पर जोर पकड़ लेगी। अभी जिस आधार पर भोजपुरी को अलग करने की मांग की जा रही है वह इन सियासतदानों के असली मंसूबों को साफ कर देती है। भोजपुरी को अलग कर देने के लिए तर्क के बजाये सबसे बड़ा आधार भवानाओं को बनाया जा रहा है जिससे जैसे कभी हिन्‍दू और मुसलमान आमने सामने किये गये वैसे ही हिन्‍दी और भोजपुरी को भी आमने सामने किया जा सके। उप्र और बिहार के 15 से 20 करोड़ लोगों की बोली है भोजपुरी। यह बोली ही है जो भाषा को ताकत देती है। भोजपुरी लोकरंग से जोड़ती है और हिन्‍दी उन्‍हें सम्‍मान के साथ रोजगार दिलाती है। यह वह लोग हैं जो‍ हिन्‍दी और भोजपुरी में फर्क नहीं करते। पिछले करीब साठ सालों में सत्‍ता की चालब‍ाजियों और मक्‍कार अफसरों के भरोसे रहने के बाद भी जिस हिन्‍दी को खत्‍म नहीं किया जा सका दरअसल इसके पीछे उसका यही विशाल परिवार था। सरकारी चालबाजियों के बावजूद हिन्‍दी अपने इसी विशाल परिवार से खाद पानी लेती रही और धीरे धीरे करके कम ही सही लेकिन उसने भी इंजीनियर, डाक्‍टर, सिविल सेवा के अफसर और यहां तक की कम्‍प्‍यूटर के जानकार तक पैदा करने शुरू कर दिये। यह हिन्‍दी के विशाल परिवार की बदौलत ही था जिसने तमाम देशों की राजभाषाओं को ठेंगा दिखा देने वाली कम्‍प्‍यूटर कम्‍पनियों को हिन्‍दी के लिए साफटेवयर विकासित करने को मजबूर कर दिया। हम सब गवाह हैं कि इसकी वजह से हिन्‍दी अब लाखों लाख युवाओं के रोजगार का जरिया बन रही है और आने वाले समय में इसमें इजाफा होना है लेकिन अब जब भोजपुरी, राजस्‍थानी, अवधी, छत्‍तीसगढ़ी को अलग कर दिये जाने की बात चल रही है तो ऐसे में क्‍या हिन्‍दी इस ताकत के साथ आगे बढ़ सकेगी। आज जब तकनीकी पढ़ाई से लेकर अन्‍य जटिल विषयों के लिए हिन्‍दी में पाठय समाग्री उपलब्‍ध हो रही है, यूएनओ की भाषा बनने की होड़ में हिन्‍दी तेजी से आगे बढ़ रही है तो ऐसी दशा में भोजपुरी को अलग करने जैसी अंसगत मांग न सिर्फ हिन्‍दी का नुकसान करेगी बल्कि उत्‍तर भारतीयों के विकास की एक सीढ़ी भी कम कर देगी।

हम सभी भाषा प्रेमी भोजपुरी समेत अन्‍य सभी आचंलिक बोलियों के विकास को जरूरी मानते हैं और निश्चित तौर पर इनके विकास के लिए सरकार को प्रयास करने चाहिये। बोलियां हों या भाषा उसकी पूंजी सिर्फ उसके शब्‍द होते हैं इसलिए मानक स्‍तर पर उनके शब्‍दों को सहजने के लिए सरकार की ओर से कदम उठाये जाने चाहिये लेकिन ऐसा कुछ न करके सिर्फ हिन्‍दी की कीमत पर बोलियों को अलग कर दिये जाने की मांग को कहीं से भी जायज नहीं ठहराया जा सकता। इसलिए इस बार देर हो और हम भोपाल गैस काण्‍ड में फैसला आने के बाद एण्‍डरसन के तलाश करने जैसी मुहिम शुरू करें उसके पहले ही हिन्‍दी के लिए हाथ बढ़ाये और कम से कम राष्‍टपति से एक पोस्‍टकार्ड के जरिये हिन्‍दी के बंटवारे पर अपनी असहमति दर्ज करायें। इस बार इसकी कामन भोजप‍ुरियों को उठानी होगी ठीक वैसे ही जैसे हिन्‍दी को राजभाषा का दर्जा दिलाने की कमान एक गुजराती ने सम्‍भाली थी।

किरदारों की फिल्‍म


कथानक को लेकर चर्चा बटोर रही पीपली लाईव की कास्टिंग का कायल हुए बिना नहीं रहा जा सकता। बहुत दिनों बाद किसी फिल् के किरदारों में जिन्दगी में इधर- उधर बिखरे लोगों के चेहरों को चस्पा पाया। वह लालबहादुर देने आया मटमैला सा स्वेटर पहने बीडीओ हो या बात- बेबात अपनी बहू को गरियाती अम्मा। सारे किरदार मिलकर फिल् को हमारे समय का जींवत दस्तावेज सा बना देते हैं।

यह हबीब तनवीर के नया थियेटर के रंगकर्मियों का कमाल है। फिल्‍म के ज्‍यादातर अभिनेता इस थियेटर से जुडे़ हुये थे। दिल्‍ली में इस थियेटर के कुछ नाटक देखे थे जो अपने सादेपन और दर्शकों से संवाद बना लेने की अनोखी सादगी के चलते अभी तक दिमाग में ताजे हैं। इस थियेटर के कलाकारों को जब सेल्‍युलाइड के परदे पर काम करने को मिला तो उन्‍होंने गजब ही ढा दिया। अम्‍मा के किरदार में फारूख जफर ठेठ बुन्‍देलखण्‍डी में अपनी बहू धनिया को माटी मिले गरियाती हैं तो वह सास के अभी तक के तकरीबन सभी किरदारों को माटी में मिला रही होती हैं। बैकग्राउण्‍ंड म्‍यूजिक के तामझाम और पौश्‍चयर के बिना सिर्फ उनकी आवाज की लय ही परम्‍परागत सास को परदे पर साकार कर देती है। गले तक कर्ज में डूबे किसान की बीवी का अपना दर्द है। यह दर्द उसे हताश करता है लेकिन बदले में उसे अक्रामक भी बना देता है। जूते लेकर घर के मर्दों पर झपट पड़ने वाली गांव की स्‍त्री का यह नया किरदार है और जेएनयू की पढ़ी शालिनी वत् ने इसे बखूबी निभाया है।

खड़खड़ी जीप और मटमैला सा स्वेटर पहनकर नत्था को लालबहादुर देने आये बीडीओ के रोल में दत्‍ता सोनवने भी खूब जमे। उनकी बाडी लैग्वेज उकताये ब्लाक अफसर की तरह ही थी। ऐसा अफसर जो चापाकल को सिर्फ योजना के सहारे ही पहचानता है। उनके रोल को देखकर लगता है कि उन्होंने किसी सरकारी मुल्जिम का बड़ी बारीकी से अध्ययन किया है। गाड़ी पर चढ़ना, भुक्तभोगी को खोजना और फिर उसे दुत्कारना सबकुछ सरकारी रहा।

कभी किसान रहा होरी महतो अब पेट के लिए मजदूर में तब्‍दील हो चुका है। यह उस समय की बात है जब लोकतन्‍त्र के सहारे चलने वाले इस देश में करोड़पति सांसदों की तादात एकबारगी बढ़ गयी। पूरी फिल्‍म में होरी सिर्फ गढ़ढा ही खोदता जाता है और उसका सिर्फ एक संवाद मजदूर के पेट और पीठ के बीच के अंतर और सांसदों के अश्‍लील तरीके से बढ़ते वेतन पर एक तीर की तरह चुभ जाता है। बाद में उसी गढढे में गिरकर मर जाना ही उसकी नियति साबित होती है। इस समाज में हमने उसके लिए सिर्फ इतनी ही जगह छोड़ी है। होरी की यह वास्‍ताविक भूमिका एलएन मालवीय ने अदा की है। अपने आकाओं के खूंटे में बंधे गांव ज्‍वार के थानेदार किस हद तक लम्‍पट हो उठते हैं इसे अनूप त्रिवेदी ने बखूबी जिया है। अनूप भी एनएसडी के छात्र रहे हैं और काफी समय से रंगमंच में बराबर से सक्रिय रहे हैं।

मीडिया प्रहसन का सारा दारोमदार टीवी चैनल के रिपोर्टर बने कुमार दीपक पर था। जिसे विशाल शर्मा ने पूरी विश्‍व‍सनीयता के साथ जिया। कम से कम हम टीवी अखबारों में काम करने वाले तो असानी से अपने साथियों के बीच किसी न किसी कुमार दीपक को पहचान सकते हैं। फिल्‍म का राकेश अखबारों और टीवी की दुनिया का नत्‍था है। नत्‍था समाज के हाशिये पर और राकेश मीडिया के। राकेश जब नत्‍था और होरी के द्वंद्व के बीच उलझता है तो दिल्‍ली की पत्रकार उसे खबरों का सच बताती है। यह सच फिर सिर्फ खबरों का सच नहीं रह जाता बल्कि उसमें काम करने वालों का भी सच बन जाता है। द्वंद्व के बीच राकेश की भूमिका में नवाजुउददीन की मेहनत झलकती है। पूरी फिल्‍म में बाजार से सिर्फ राकेश ही विचलित होता है और फिल्‍म में सिर्फ उसी की मौत होती है।

ओंकारदास माणिकपुरी का सपाट चेहरा देश के लाखों किसानों का चेहरा है। फेयर एण्‍ड लबली से पुते चेहरे जिन पर सिर्फ किसान दिखाने के लिए मूंछ चिपका दी जाती और बिना सिर पर एक गमछा लेपटे उसे किसान नहीं माना जा सकता के चलन के बीच ओंकारदास माणिकपुरी ने नत्‍था के तौर पर किसानों के किरदार में नये आयाम दिये हैं। चलने से लेकर खाने और फिर बोलने तक की एक एक बारीक डिटेल्‍स आप ओंकार के अभिनय में देख सकते हैं। बुधिया के रोल में चुटकी बजाकर जिस अंदाज में रघुवीर यादव, मरै पर पइसा मिली, पइसा का अश्‍लील सा लगता तंज कसते हैं, वैसी सहजता से दूसरे अभिनेताओं के लिए यह करना काफी मुश्किल होता। और इस खूबसूरत फिल्‍म के लिए अनुषा रिजवी और महमूद फारूखी की सराहना करनी होगी जो बिना आइटम नम्‍बर के मोह के भी बाजार में रह कर बाजार की हकीकत के फिल्‍में बना सकें।

खून के धब्‍बे धुलेंगे, कितनी बरसातों के बाद


खून के धब्‍बे धुलेंगे, कितनी बरसातों के बाद,

बरस बीते,

बौछारें आई पर

खून के धब्‍बे धुले

नहीं।

कभी बंटवारे की टीस से पैदा हुई फैज अहमद फैज की यह मशहूर नज् आज 63 गुजर जाने के बाद भी हजारों परिवार का दर्द बयां करती है। आजादी के साथ मिली इस टीस के भी 63 साल पूरे हो गये लेकिन दोनों मुल्कों के तल् रिश्तों के चलते वीजा मिलना आज भी मुहाल है लिहाजा इंसानी जिंदगी के लिए जिन रिश्तों को खाद पानी समझा जाता है वह इन दोनों देशों के हजारों लोगों के सिर्फ जेहन में ही जिन्दा बचे हैं। मुल्कों की अदावत की कीमत चुका रहे इन लोगों के लिए अपने सगे का मरना सिर्फ एक खबर भर है और कभी जश् का मौका आता है तो अकसर ही सरहद दीवार बनकर आड़े जाती है।

इलाहाबाद में हजारों परिवार इस विडम्‍बना के साथ पिछले कई दशकों से अपना गुजर कर रहे हैं। इनके सगे नातेदार और दूसरी रिश्‍तेदारियां पकिस्‍तान में हैं लेकिन मुल्‍कों के बीच चलने वाली अदावत की कीमत इन्‍हें अपने इन रिश्‍तों को ताक पर चढ़ाकर अदा करनी पड़ रही है। आज स्‍टोरी करने के लिए कुछ लोगों से मिला तो ऐसी तमाम कहानियां सामने आयीं कि खुद पर ही शर्मिदंगी सी आने लगी- यह किसका अपराधबोध हावी हो रहा था मुझे पर !!!

नखासकोहना के रहने वाले उमर 80 बरस पूरे कर चुके हैं। जवानी में ही भाई पकिस्‍तान जाकर बस गया था। और उसके बाद से अभी तक सिर्फ तीन बार की मुलाकात है। अब आखिरी समय की मुलाकात के भी इतना समय बीत गया कि अपने सगे भाई की सूरत भी उन्‍हें ठीक से याद नहीं। भाई उनके लिए सिर्फ एक धुंधली पड़ चुकी पारि‍वारिक फोटो में जिन्‍दा है। इस तस्‍वीर में सभी के बाल काले हैं, चेहरे भरे हुये नहीं हैं लेकिन सभी की ठुठि़यां नुकीली हैं। आज समय के साथ उमर के सारे बाल सफेद हो चुके हैं। चेहरा पहले भरा और अब फिर खाली हो चुका है। उनकी आंखों में अपने भाई के लिए खालीपन आज भी नजर आता है लेकिन क्‍या करें, बेबस हैं। हुकुमत के आगे उनकी नहीं चल सकती। हुकुमत शायद उनके आने जाने में ही आंतकवादी तलाश ले। उमर बताते हैं, भाई से आखिरी मुलाकात सन 80 की है और उसके बाद से वीजा के लिए होने वाली पूछतांछ से आजिज आ कर इसकी कोशिश ही करनी छोड दी। उमर साथ ही यह भी जोड़ते हैं कि पकिस्‍तान से भी यहां आने में ऐसी ही मुश्किलें उठानी होती है।

इसी से बहुत हद तक मिलती जुलती कहानी मेहरूनिसा की है। उनका मायका मुल्‍कों के तल्‍ख रिश्‍तों की भेंट चढ चुका है। मेहरूनिंसा फ़लैशबैक में जाती हैं तो बेहद मायूस हो जाती हैं। वे बताती हैं कि शादी के बाद सिर्फ दो बार ही मायके वालों से मिलना हो सका। इस बीच दोनों परिवारों में जश्‍न भी हुये और गम भी आये लेकिन फिर वह लौट कर अपने परिवार के बीच नहीं जा सकीं। बच्‍चे ननिहाल के लिए जिंदगी भर तरासते रह गये तो अब्‍बू नवासों के लिए।

महफूज भी हमें ऐसा ही किस्‍सा सुनाते हैं। महफूज पेशे से शिक्षक हैं इसलिए हमें और जरा पीछे ले जाकर तफसील से बताते हैं कि म‍ुश्किल पहले भी थी लेकिन हालत वर्ष 92 के बाद से जो बिगड़ने शुरू हुये तो 2000 आते आते तो स्थिति यह हो गयी कि पकिस्‍तान फोन करने में भी जी घबरता है।

इसके बाद महफूज भाई ठहर गये। शायद मन ही मन आज के समय को देखते हुये यह सब बातें एक अखबार वाले से कहने के बारे में सोचने लगे लेकिन कुछ देर के बाद महफूज और भी खुल गये। फिर बातें औपचारिक से औनपचारिक शुरू हो गयीं। इसी औनपचारिक बात में महफूज ने अपने मन की गांठें खोलनी शुरू की। उन्‍होंने कहाकि वीजा का मिलना न मिलना अब एक अलग मामला हो गया है लेकिन इस समय के माहौल को देखकर अब खुद ही लोग डर कर नहीं बताते कि उनकी रिश्‍तेदारियां पकिस्‍तान में है। उनके भीतर यह डर पूरी तरह से हावी दिखाई दिया कि पुलिस को जब कही कुछ नहीं मिलेगा तो इसी रिश्‍तेदारियों के आधार पर वह हम लोगों को उठा लेगी इसलिए अब तमाम लोग वीजा के लिए फार्म तक नहीं भरते। इन लोगों ने अपनी रिश्‍तेदारियों को अपने सीने मे ही इस उम्‍मीद के साथ दफन कर लिया कि शायद कभी ऐसी बरसात आये जिसकी बौछारों से खून के यह धब्‍बे हमेशा के लिए साफ हो जायेंगे।

तुम्‍हारी पालिटिक्‍स क्‍या है पार्टनर !





अभी तक तस्लीमा नसरीन और मकबूल फिदा हुसैन की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर जो जार-जार आंसू बहा रहे थे, सत्ता के दमन को जी-भर कोस रहे थे, छिनाल प्रकरण के बाद वह खुद बेपर्दा हो गये। विभूति राय ने जो कहा वह तो अलग विमर्श की मांग करता है लेकिन जिस तरह सजा का एलान करते हुये स्वनाम धन् लोग विभूति के पीछे लग लिये उसने कई सारे सवाल पैदा कर दिये।

विभूति राय की टिप्‍पड़ी के बाद विरोध का पूरा का पूरा माहौल ही दरबारीनुमा हो गया। ज्‍यादातर, एक सुर मेरा भी मिलो लो की तर्ज पर विभूति की लानत मनालत में जुटे हैं। हमारे कई साथी तो इस वजह से भी इस मुहिम का हिस्‍सा बन लिये की शायद इसी बहाने उन्‍हें स्त्रियों के पक्षधर के तौर पर गिना जाने लगे। लेकिन एक सवाल हिन्‍दी समाज से गायब रहा कि- विभूति की‍ टिप्‍प़डी़ के सर्न्‍दभ क्‍या हैं। इस तरह एक अहम सवाल जो खड़ा हो सकता था, वह सामने आया ही नहीं।

जबकि विभूति ने साक्षात्कार में यह अहम सवाल उठाया कि महिला लेखिकाओं की जो आत्मकथाएं स्त्रियों के रोजाना के मोर्चा पर जूझने, उनके संघर्ष और जिजाविषा के हलाफनामे बन सकते थे आखिर वह केलि प्रसंगों में उलझाकर रसीले रोमैण्टिक डायरी की निजी तफसीलों तक क्यूं समिति कर दिये गये। इस पर कुछ का यह तर्क अपनी जगह बिल्कुल जायज हो सकता है कि आत्मकथाएं एजेण्डाबद्व लेखन का नतीजा नहीं होंती लेकिन अगर सदियों से वंचित स्त्रियों का प्रतिनिधित् करने वाली लेखिकाएं सिर्फ केलि प्रसंग के इर्द-गिर्द अपनी प्रांसगिकता तलाशने लगे तो ऐसे में आगे कहने को कुछ शेष नहीं बचता। हम पाठकों के लिए स्त्री विर्मश देह से आगे औरतों की जिन्दगी के दूसरे सवालों की ओर भी जाता हैं। हमें यह लगता है कि धर्म, समाज और पितसत्तामक जैसी जंजीरों से जकड़ी स्त्री अपने गरिमापूर्ण जीवन के लिए कैसे संघर्ष पर विवश है उसकी तफलीसें भी बयां होनी चाहिये। मन्नू भण्डारी, सुधा अरोडा, प्रभा खेतान जैसी तमाम स्त्री रचानाकारों ने हिन्दी जगत के सामने इन आयमों को रखा है।अन्‍या से अनन्‍या तो अभी हाल की रचना है जिसमें प्रभा खेतान के कन्फेस भी हैं लेकिन बिना केलि-प्रंसगों के ही यह रचना स्त्री अस्तित् के संघर्ष को और अधिक मर्मिम बनाती है।

अगर यही सवाल विभूति भी खडा करते हैं तो इसका जवाब देने में सन्‍नाटा कैसा। जबकि एक तथाकथित लम्‍पट किस्‍म के उपन्‍यासकार को ऐसी टिप्‍पड़ी पर जवाब देने के लिए कलमवीरों को बताना चाहिये कि- हजूर ! आपने जिन आत्‍मकथात्‍मक उपान्‍यासों का जिक्र किया है उसमें आधी दुनिया के संघर्षो की जिन्‍दादिल तस्‍वीर हैं और यौन कुंठा की वजह से आपको उनके सिर्फ चुनिंदा राति-प्रंसग ही याद रह गये।

मकबूल फिदा हुसैन का समर्थन करके जिस असहमति के तथाकथित स्‍पेस की हम हमेशा से दुहाई सी देते आये इस प्रकरण के बाद इस मोर्चे पर भी हमारी कलई खुल गयी। तमाम बड़े नामों को देखकर यह साफ हो गया कि अभी भी हमारे भीतर असहमति का कोई साहस नहीं है और अतिक्रमण करने वाले के खिलाफ हम खाप पंचायतों की हद तक जा सकते हैं। इन सबके बीच कुछ साथी छिनाल शब्‍द के लोकमान्‍यता में न होने की बात कहते हुये भी कुलपति को हटाने की मांग की

लेकिन आज अगर आज लोकमान्‍यता के प्रतिकूल शब्‍द पर कुलपति हटाये जाते हैं तो हुसैन साहब की बनायी तस्‍वीरों को अभिव्‍यक्ति की स्‍वतत्रन्‍ता के नाम पर हम कैसे आगे बचा सकेंगे क्‍यूंकि लोकमान्‍यता के समान्‍य अर्थो में शायद ही कोई हिन्‍दू सीता की नग्‍न तस्‍वीर देखना पंसद करे। और इसी तरह फिर शायद हम तस्‍लीमा के लिए भी सीना नहीं तान सकेंगे क्‍यूंकि शायद ही कोई मुसलमान लोकमान्‍यता के मुताबिक धर्म को लेकर उनके सवालों से इत्‍तेफाक करेगा।

पहले ही कह चुका हूं कि विरोध को लेकर माहौल ऐसा दरबारीनुमा हो गया है कि प्रतिपक्ष में कुछ कहना लांछन लेना है। बात खत्‍म हो इसके पहले डिस्‍कमेलटर की तर्ज पर यह कहना जरूर चाहूंगा कि विभूति नारायण राय से अभी तक मेरी कुछ जमा तीन या चार बार की मुलाकात है, जो एक साक्षात्‍कार के लिए हुयी थी। इसका भी काफी समय हो चुका है और शायद अब विभूति दिमाग पर ज्‍यादा जोर देने के बाद ही मुझे पहचान सकें। तथाकाथित स्‍त्री विमर्श के पक्ष में चल रही आंधी में मेरे यह सब कहना मुझे स्‍त्री विरोधी ठहारा सकता है लेकिन इस जोखिम के साथ यह जानना जरूर चाहूंगा कि आखिर, पार्टनर! तुम्‍हारी पालिटिक्‍स क्‍या है….

गुलामी की मशाल





राष्ट्मण्‍डल की दौड़ शुरू हो चुकी है। क्‍वीन्‍स बेटन थामे हम शहर-शहर की सड़कों को नापने निकल पडे हैं। क्‍वीन्‍स बेटन से बढकर दूसरा कोई गौरव नहीं। इस अति-भावुककाल में जब हमारी भावनाएं छींक की मानिंद नाजुक हो चली हैं और कोई सि‍रफिरा जुमलेबाज एक बेहद मामूली जुमले से इन्‍हें आहत कर देता है, तो भी ऐसी नाजुक भावनाओं के सीने पर चढ़कर ब्रिटेन की महारानी की बेटन दुनिया के सबसे बडे लोकतन्‍त्र की सडकों पर गर्व से सैर कर रही हैं।

कभी इतिहास की किताबों में पढ़ा था कि जिन देशों में ब्रिटिश शासन था, उन्‍हें आजाद करते वक्‍त उनके लिए ब्रिटिश सरकार ने राष्ट्मण्‍डल बना दिया। आश्चर्य की बात यह कि इनमें से ज्‍यादातर देशों के लोकतन्त्रिक होने के बावजूद अभी भी इसके अध्‍यक्ष के लिए चुनाव नहीं कराये जाते बल्कि इसे महारानी के लिए सुरक्षित रखा जाता है। इसके अलावा तकरीबन सभी खेल आयोजनों में पिछले आयोजक देश की ओर से अगले आयोजक देश को मशाल या उसका प्रतीक चिन्‍ह सौंप दिया जाता है। ओलाम्पिक, एशियाड जैसे तमाम खेलों में यही रवायत चलती है लेकिन राष्ट्मण्‍डल खेलों से पहले हर आयोजक देश को ब्रिटेन जाकर उस मशाल को लेकर आना पड़ता है। इस बार हमारी राष्‍ट्पति ने बर्मिघम जाकर यह मशाल ग्रहण की शायद इसलिए यह बेंटन हमारी भावनाएं आहत नहीं करती।

सरकारें क्‍वीन्‍स बेटन के सत्‍कार में पहले ही बिछी-बिछी सी हैं। सरकारों की भावनाएं इस मामले में घुलमिल गयी हैं। अकसर किसी न किसी बात पर आमने-सामने आ जाने वाली सरकारों के बीच इस मामले में अपनापा है। बेटन अमेठी भी घूम रही है, लखनऊ भी। सभी जगह स्‍वागत में अफसरों ने पलक-पावड़े बिछा रखे हैं। क्‍या आईएएस और क्‍या पीसीएस। सभी अपनी सरकार के लिए फिक्रमंद हैं।

प्रशासन की तरह अखबारों की अपनी तैयारियां हैं। अखबार के दफतरों में पिपली लाईव के एक दृश्‍य की तरह फोटूओं और खबरों के लिए हांक लगायी जा चुकी है। उन्‍हें सिर्फ बैटन की सुन्‍दर तसवीरें ही चाहिये और अगर वह सुन्‍दर हाथों में हो तो फिर क्‍या कहने....!

महारानी की यह दुलारी बेंटन इलाहाबाद पहुंची तो चिल्‍लर के भाव में अफसर भाग रहे थे। ललकारे जा चुके मीडिया के लोग धकियाये जा रहे थे। क्‍‍वींन्‍स बेटन कुछ देर सुभाष चौराहे पर ठहरी, एक पल के लिए दूसरे कोने में खडी हुयी। चौराहे के बीच कई बरसों से हाथ लहरा रहे सुभाष चन्‍द्र को कुछ चुनौती सी देती दिखी कि देखो तुम्‍हारे जन्‍मदिन पर आज के एक तिहाई भी नहीं पंहुच पाते होंगे।

इलाहाबाद में विरोध करने वालों की अच्‍छी-खासी संख्‍या और उसका एक निश्चित वर्ग है। दुनिया के किसी भी मुद़दे पर पुतला फुंकने वाले यहां हाजिर हैं। शर्त सिर्फ इतनी की अखबार में फोटो किसी न किसी बहाने रोजाना छपनी चाहिये, लेकिन अखबार रंग में भंग नहीं डालना चाहते इसलिए शायद इन बेचारे का उत्‍साह भी ठण्‍डा है।

प्रदर्शनों की बात चल रही है तो इसको भी समझ लीजिये,

कायस्‍थ समाज का एक वर्ग एक टीवी सीरियल में अपने वर्ग के खिलाफ टिप्‍पड़ी से खफा है। सीरियल के कुछ सम्‍वादों और एक पात्र से उनकी भावनाएं इस कदर आहत हो गयी हैं कि इस वर्ग को इसमें चुनावी मुद्दे के बनने की ताकत नजर आने लगी। उसने बकायदा अगले निकाय चुनाव इसी मुद्दे के आधार पर लड़ने का एलान भी कर दिया है।

राजनीति की नर्सरी के तौर पर पूरे देश में पहचाना जाने वाले इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय के छात्रनेता छात्रों की लडाई के बाद भगोड़े हो चुके हैं और अब नयी सीवर लाईन के लिए खोदे जा रहे गढ्ढों के खिलाफ नगर आयुक्‍त का पुतला फुंक कर अपने को जिन्‍दा रखने की कोशिश कर रहे हैं।

इलाहाबाद की सड़कें भी दूसरे शहरों की तरह शान्‍त हैं जिस पर ब्रिटिश शान की प्रतीक मशाल शान से गुजर रही है और हम और आप महज तमाशबीन।

पापूलर सिनेमा की “राजनीति”

प्रकाश झा फिल्मकार के साथ-साथ नेता भी रहे हैं। उनके गढे फिल्मी किरदार चुनावों के दौरान कामयाबी के लिए जिस बिसात को बिछाते हैं वैसी बिसात झा आज से तीन बरस पहले बिहार जैसे धुर राजनीति इलाके में बिछा चुके हैं।

कहा जा सकता हैं कि प्रकाश झा जनता, फिल्और राजनीति तीनों को जोडने वाले सूत्र का जारिया बन सकते थे। उनकी ओर से जब राजनीति पर केन्द्रित फिल्बनाने की बात आयी तो उम्मीद जगी कि एक नया आयाम सामने आयेगा, जो हमें बतायेगा कि नहीं, राजनीति और समाज के रिश्ते सिर्फ उतने नहीं, जितने अकसर अखबारों और फिल्मों में बयान होते हैं। यह फिल्शायद इन किस्सों को नया विस्तार दे और फिल्कोई नया कैनवास रचे लेकिन ऐसा कुछ होता नहीं दिखा। प्रकाश झा ने कोई भी जोखिम नहीं उठाया। पापलुर सिनेमा राजनीति, नेताओं और समाज को जैसा देखता है उन्होंने भी ठीक उसी तरह इसे फिर पेश कर दिया। आज के समय में चारों ओर लतियाये जा रहे नेताओं की दुर्गत इस फिल्में भी ऐसी ही होनी थी।

फिल् परिवार के बीच वर्चस् के जंग की कहानी कहती है लेकिन कथानक में यह विडम्बना से अधिक त्रासदी कीतरह घटती है। फिल् के आखिरतक प्रकाश झा पर भी वालीबुड निर्देशक होने का मोह पूरी तरह हावी हो जाता है।तभी, करीब दो घण्टे निर्देशक ने जिस रणवीर कपूर को बडे जतन से सफेदपोश लेकिन शातिर राजनेता साबितकरने में खर्च कर दिये उसी के हाथ में रिवाल्वर थमाकर दुश्मन पर गोली भी चलवा दी। शायद निर्देशक को रणवीरकी गोली से ही दर्शकों की तालियों के भी निकलने की उम्मीद रही होगी। पापुलर सिनेमा की अपनीमजबूरियां…….! ‍‍‍ ‍ ‍ ‍‍ ‍

देश में परिवार के बीच सत्ता संघर्ष नयी बात नहीं। कुर्सी के बिना भी सामान्परिवारों में सत्ता संघर्ष का खेल रोजाना खेला जाता है।

प्रदेश की सत्ता को आसानी से मुठठी में रखने वाले परिवार के भीतर इसी सत्ता के लिए संघर्ष छिड जाता है।वंशवाद की जिस परम्परा को आगे बढाया जा रहा है उसमें स्वाभाविक उत्तराधिकार ज्येष् पुत्र का होता है लेकिनयहां वीरेन्द्र प्रताप सिंह उर्फ वीरू को पीछे छोड उसके चाचा को गददी दे दी जाती है। वीरू को यह नागावर गुजरता हैऔर यहीं से शुरू होती है राजनीति। परिवार की इस राजनीति के बीच सूरज का आना होता है। आखिर में सूरज हीपूरे परिवार के खत् हो जाने की कडी साबित होता है। भाई को जिन्दा बचा पाने में नाकाम समरप्रताप अपनीभाभी इन्दु को मुख्यमंत्री बना कर अपनी थिंसिस जमा करने अमेरिका चला जाता है।‍‍ ‍‍‍‍‍ ‍ ‍‍ ‍‍

पूरी फिल्वीरेन्द्र सिंह और समर प्रताप सिंह के इर्द गिर्द घुमती है। अजय देवगन और नाना पटेकर अपने सिनेमाई कद के सहारे सिर्फ अपने रोल को आगे बढाते हैं लेकिन वीरेन्द्र सिंह की बेचैनी को मनोज बाजपेई ने खूबसूरती के साथ परदे पर उतारा है। पूरी फिल्के दौरान पैंट शर्ट में रहने वाला वीरेन्द्र सिंह अपने संवादों की वजह से भी दूसरे अभिनेताओं पर भारी पडा है। इसी तरह खामोश रहकर अपना काम करते जाने वाले पोलैटिकल मैनेजर के रोल में रणवीर कपूर भी खूब फबे हैं।

एक मां के लिए पुत्र के सामने कुंवारी मां बनने की स्थिति को कबूलना मंझी अभिनेत्री के बस की ही बात है लेकिन इसके अभाव में यह फिल्का सबसे दयनीय सीन बन जाता है। इसी तरह फिल्के कई हिस्से बुरी तरह नाटकीयता से भरे हैं लेकिन इन सबके बावजूद फिल्में गति है। फिल्की गति तो इतनी तेज है कि पात्रों को अपना चरित्र तक गढने की मोहलत नहीं मिलती। फिल्में कोई भी चरित्र अपना मुकाम खुद से गढता नहीं दिखता, सिवाय यूथ महिला लीडर के"……! दलित बस्ती में सूरज के सिवाय कोई दूसरा मजबूत दलित नहीं। पूरी फिल्में दलित पात्र बताये गये सूरज की उपलब्धि सिर्फ कबडडी मैच जितने के सिवाय कुछ नहीं रही लेकिन वह चंद दिनों के बाद ही सीधे महासचिव के डांइमरूम का हिस्सा बन जाता है।

राजनीति की तमाम विंसगतियों और तल् हकीकतों को हाशिये पर डालते हुये दामुल और गंगाजल के निर्देशककी यहराजनीतिकहीं पापलुर सिनेमा के लिए नया प्रस्थान बिन्दू तो नहीं।‍ ‍‍

Powered by Blogger